वर्तमान समय के साइबर अपराध एवं विधिक व्यवस्था

 

राकेश कुमार राय

स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय सागर

 

प्रस्तावना

यह एक वर्तमान तकनीकि का अपराध है जो सूचना तकनीकी के द्वारा मानव मस्तिष्क का एक आपराधिक कृत्य प्रस्तुत करता है। जो अपराध की नई स्पीसीज है, इस प्रकार के अपराध स्वयं के ईगो या किसी अन्य की हानि का परिणाम हो सकती है। इस प्रकार के अपराध से सारा विश्व पीड़ित है। इनकी संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है। यह अपराध विधि प्रवृतक विधिक संस्थाओं के सामने निरंतर भयंकर निरंतर नये रूप में सामने आ रहा है। क्योंकि तकनीकि का विकास दिन प्रतिदिन नये रूप एवं नये ढंग से सामने आ रहा है इस अपराध की विशेषता में साइलेन्ट नेचर, ग्लोबल करेक्टर, हाइइम्पेक्ट, हाइपोटेन्शियल एवं अपराध घटना स्थल पर अपराधी की उपस्थिति न भी हो तो भी अपराध को मूर्त रूप दिया जा सकता है और इसके अपराधी व पीड़ित एक दूसरे के सम्पर्क में न भी रहे हो वो एक दूसरे को न भी जानते हो तब भी अपराध किया जा सकता है इसमें अपराधी की पहचान एवं पकड़े जाने की संभावना एक दम नगण्य हो जाती है।

 

साइबर अपराध की एक व्यवस्थित सर्वमान्य परिभाषा ठीक प्रकार सूचना प्रौघोगिकी अधिनियम 2000 में भी व्यक्त नहीं की गई है। किन्तु यह कम्प्यूटर जनित अपराध है , जो साइबर स्पेस में घटित होता हैं।

 

इस अपराध की निरंतरण में वृद्धि का मूल कारण थोड़ा सा दुःसाहस के साथ न पकड़े जाने का विश्वास ही प्रमुख है जिसमें इसका क्रियान्वयन किसी भी स्थान से किया जाना साक्ष्य या डाटा को आसानी से नष्ट किया जाना ही पर्याप्त है इस अपराध की एवं अपराधी माॅडस आॅपरेन्डी भी विशेष पहचानने योग्य वर्तमान में नहीं समझ में आती।

 

प्रचलित साइबर अपराध

ऽ ई-काॅमर्स डिजीटल संचार (मुख्यतः इन्टरनेट) के माध्यम से वस्तुएं एवं सेवाओं का क्रय विक्रय एवं राशि का हस्तांतरण

ऽ ई-काॅमर्स इन्टरनेट के विकास का महत्वपूर्ण पहलू है यह आम व्यक्ति को समय एवं दूरी की सीमा से परे वस्तुएं सेवाओं के लेनदेन की अनुमति प्रदान करता है।

ऽ शरारती तत्व नई तकनीक का उपयोग करने में सामान्यतया अग्रणी होते है जो संगठित आपराधिक समूह आॅनलाईन क्रेडिट कार्ड फ्राड, ई-मेल फ्राड

ऽ परंपरागत अपराध सूचना की चोरी, अवैध वस्तुओं की बिक्री (अश्लीलता, मादक द्रव्य, हथयार आदि) हवाला

ऽ अन्य अपराध में स्पाम, फिशिंग, हैकिंग, वायरस, विनायल आॅफ सर्विस अटैक,

ऽ कार्ड की पायरेसी, सिम की पायरेसी

 

सायबर अपराध की प्रकृति मुख्य रूप से -

मानव के विरूद्ध अपराध  अश्लीलता, मानहानि, सायवर स्टाकिंग।

 

सम्पत्ति के विरूद्ध  डाटा की चोरी, पायरेसी, हैकिंग, फिशिंग/स्पकिंग ई कामर्स संबंधी ।

 

वित्तीय अपराध  क्रेडिट कार्ड फ्राड, बैकिंग फ्राड, एकाउंट का नियंत्रण, थर्ड पार्टी के बैकिंग अकाउंट, एटीएम कार्ड का अनाधिकृत उपयोग, अनाधिकृत उपयोग हेतु जानकारी प्राप्त करने के तरीके, वैयक्तिक डाटा पर व्यक्ति की पहुंच आदि एकाउंट टेक ओवर तकनीकी के विरूद्ध, डिनाॅयल आॅफ सर्विस अटैक, कम्प्यूटर रिसोर्सिस को उसके वांछनीय यूजर हेतु अनुपलब्ध करना, किसी व्यक्ति के इंटरनेट समय का अनाधिकृत उपयोग, पासवर्ड चोरी ।

 

शासन के विरूद्ध अपराध सायबर आतंकवाद हैकिंग/फिशिंग/स्निफिंग द्वारा, हवाला, फर्जी डिजिटल सर्टिफिकेट प्राप्त करना, इलेक्ट्रानिक अभिलेखों की धोखाधड़ी आदि।

 

साइबर अपराध को आई.टी एक्ट की निम्न धाराओं में कवर किया गया है। अनाधिकृत अभिगमन धारा 43, रिटर्न या जानकारी प्रस्तुत करने में विफल रहने का अपराध धारा 44, अधिनियम के अंतर्गत बनाये गये नियमों का उल्लंघन धारा 45, इलेक्ट्राॅनिक फार्म में अश्लील जानकारी का प्रकाशन धारा 67, कंट्रोलर के नियमों का पालन नहीं किया जाना धारा 68, कम्प्यूटर स्त्रोत से जनित जानकारी को बीच में ही रोकने का परिवीक्षण करने या मिटाने हेतु निर्देश देने की शक्ति धारा 69, संरक्षित सिस्टम में अभिगमन या प्रवेश धारा 70, दुव्र्यपटेशन (मिशप्रजेन्टेशन) धारा 71, गोपनीयता या निजता भंग के लिये शक्ति धारा 72, गलत ब्योरे सहित डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र का प्रकाशन धारा 73, कपटपूर्ण उद्देश्यों के लिये डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र प्रकाशित करना धारा 74

 

साइबर अपराधांे की अन्वेषण की शक्ति कंट्रोलर या प्रमाणन अधिकारी को दी गई है (धारा 28) इनकी यह शक्ति ठीक वैसी है, जैसी की आयकर अधिकारियों को आयकर अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त है । साइबर अपराधों के अन्वेषण हेतु पुलिस अधिकारियों द्वारा अपनाये जाने वाली प्रक्रिया का वर्णन अधिनियम की धारा 80 में उपबंधित है आई.टी. एक्ट (संशोधन) के अनुसार धारा 67, 67, 67 बी, 69, 70 के अपराध संज्ञेय होंगे धारा 78 एवं 80 आई.टी. एक्ट के अनुसार कोई भी पुलिस अधिकारी जो कि निरीक्षक की पंक्ति से नीचे न हो अन्वेषण कर सकेगा किसी सार्वजनिक स्थल में प्रवेश कर सकेगा/तलाश कर सकेगा/यह साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 49 ए के तहत प्रासंगिक तथ्य होगा ।

 

सायबर फाॅरेंसिक का लक्ष्य कानून समस्त तरीके से डिजिटल साक्ष्य निकालना है। पहचान, अधिग्रहण, सुरक्षित करना, बाहर निकालना, डाक्यूमेटेशन (इन्टरपिटेशन) अर्थ निकालना, न्यायालय में पेश करना ।

 

सूचना के स्त्रोत शिकायतकर्ता, सेवा प्रदान करने वाली वेबसाइट, भुगतान करने वाला बैंक, दूरसंचार विभाग, इंटरनेट सेवा प्रदाता, फ्राड के ट्रेक करने में सहपत्र तकनीक, उपस्थिति रजिस्टर, सिस्टम लाॅग, फ्राड में लिप्त अन्य सेवा की डिटेल, आरोपी।

 

सुरक्षा के उपाय के्रडिट कार्ड एवं डेबिट कार्ड के उपयोग के समय आॅफ लाइन या आॅन लाइन इस्तेमाल से पहले दोनो प्रकार में पूर्ण सतर्कता वर्तनी चाहिए।

 

कभी भी दोनो ओर की फोटो काॅपी कार्ड की नहीं देना चाहिये किसी अनजान को क्योंकि कार्ड वेरीफिकेशन वेलु (सी.वी.वी.) की आवश्यकता आॅन लाईन ट्राॅंन्जीशन में होती । कभी भी फोन या एस.एम.एस के द्वारा व्यक्तिगत जानकारी नहीं देना चाहिये क्योंकि कार्ड का क्लोन तो बनाया जा सकता है किंतु पासवर्ड नहीं बनाया जा सकता । यदि अंगूठा के द्वारा या वर्चुअल की कार्ड से पासवर्ड डालने पर, गैस लगाना कठिन होता है फ्राड व्यक्ति को ।

 

ई-मेल मामलों में पहचान या भेजने वाले को जानने पर ही मेल एवं अटैचमेंट फाइल को खोलना चाहिये । एक अच्छी कंपनी का अपडेट एंटीवायरस लगाना चाहिये पासवर्ड को कम से कम आठ अंक का केप्स, सिंबल, अंक, स्माल लेट आदि के साथ होना चाहिये क्योंकि गैस करने वाला हमेशा परेशान रहता है वर्तमान में अनेक गुप्त सूचना वाला प्रोग्राम आने लगे हैं जिनको ध्यान में रखना चाहिये । उदाहरण एटीएम में यदि उल्टा पासवर्ड डालने पर आपका एटीएम हैग हो जायेगा एवं पास के थानें रिंग जाने लगती है ।

 

न्याय निर्णयन अधिकारी  आई.टी. एक्ट 2000 अधिनियम की धारा 46(1) के अनुसार साइबर अपराधों में न्याय निर्णय की प्रथम अधिकारिता न्याय निर्णय अधिकारी को होगी । जिसका पद केन्द्र सरकार के निर्देशक के पद में निम्न स्तर का न हो या राज्य सरकार के इसी पद के समतुल्य स्तर से निचले स्तर का न हो । साइबर अपीलीय अधिकरण धारा 57 के अनुसार होगा ।

 

अपराध साइबर स्पेस में घटित होने के कारण अपराधियों की पहचान एक गंभीर समस्या है केवल इतना ही नही अनेक प्रकरणों में तो उत्पीड़ित व्यक्ति को भी काफी समय बाद पता चलता है कि वह किसी साइबर अपराध का शिकार हुआ है । अतः अपराध की रिपोर्टिंग में विलंब के कारण अपराधी को साक्ष्य मिटाने के लिये पर्याप्त समय मिल जाता है और वे पकड़े जाने एवं दोष सिद्धि होने से बच निकलते हैं, यह चुनौतीपूर्ण कार्य हो जाता है ।

 

संदर्भ सूची -

1     अपराधशास्त्र, दण्ड प्रशासन एवं प्रपीडनशास्त्र, परांजपे, ना वि

2     Principles of the law of evidence, Singh, Avtar

3     Cyber crimes in India, Verma, Amita

4     Techno- legal aspects of scientific evidence, Chatterjee, Ishita

5     IPC india,1860

6     Cr PC, 1973

 

 

Received on 27.04.2015       Modified on 16.05.2015

Accepted on 29.06.2015      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 3(2): April-June, 2015; Page 80-82